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चंदन वन की शांति और एक अनहोनी का साया
हिमालय की तलहटी में बसा 'चंदन वन' अपनी खुशबू और हरियाली के लिए मशहूर था। यहाँ के ऊँचे-ऊँचे साल और सागवान के पेड़ों पर हज़ारों पक्षी अपने घोंसले बनाकर रहते थे। इसी जंगल के बीचों-बीच एक बहुत ही पुराना और विशाल बरगद का पेड़ था, जिसे जंगल का 'बुज़ुर्ग' कहा जाता था।
इस बरगद के पेड़ पर कबूतरों का एक बड़ा झुंड रहता था। इस झुंड के मुखिया थे 'गगन' और उनकी जीवनसंगिनी थी 'महक'। गगन अपनी बुद्धिमानी और नीले-स्लेटी चमकदार पंखों के लिए जाने जाते थे, वहीं महक की कोमल आवाज़ और उसकी सूझबूझ पूरे झुंड को जोड़े रखती थी। चंदन वन में सब कुछ शांतिपूर्ण चल रहा था, लेकिन एक शिकारी की नज़रों ने इस शांति को भंग करने की ठान ली थी।
वह मनहूस सुबह और दाने का लालच
एक दिन सूरज की पहली किरण के साथ ही गगन ने अपने झुंड को दाना चुगने के लिए चलने का संकेत दिया। सभी कबूतर आकाश में एक सुंदर कतार बनाकर उड़ चले। मीलों उड़ने के बाद, जब वे एक सुनसान मैदान के ऊपर से गुज़रे, तो महक की नज़र नीचे ज़मीन पर पड़ी।
"देखो गगन! वहाँ घास के बीच कितने सारे पीले और चमकीले अनाज के दाने बिखरे पड़े हैं," महक ने आश्चर्य से कहा।
सभी कबूतरों के मुँह में पानी आ गया। वे उड़ान भरते-भरते थक चुके थे और उन्हें ज़ोरों की भूख लगी थी। लेकिन गगन का मन कुछ अनजाना सा महसूस कर रहा था। उसने नीचे गौर से देखा। वहाँ घना जंगल नहीं था, फिर इतने सारे दाने एक साथ एक ही जगह कैसे आ सकते थे?
गगन ने सबको चेतावनी दी, "ठहरो दोस्तों! इस सुनसान मैदान में इतने सारे दाने होना सामान्य नहीं है। कहीं यह कोई शिकारी का जाल तो नहीं? हमें सावधानी बरतनी चाहिए।"
लालच बनाम विवेक: जब सावधानी हटी
झुंड के कुछ युवा कबूतर, जिन्हें अपनी उड़ान पर बहुत गर्व था, गगन की बात से सहमत नहीं हुए। एक युवा कबूतर बोला, "मुखिया, आप हमेशा शक करते हैं। यहाँ दूर-दूर तक कोई इंसान नहीं दिख रहा है। अगर हम अभी नहीं उतरे, तो कोई और पक्षी ये दाने खा जाएगा।"
भूख के मारे बाकी कबूतरों ने भी गगन की बात अनसुनी कर दी। महक ने भी सोचा कि शायद गगन आज ज़रूरत से ज़्यादा ही सोच रहे हैं। धीरे-धीरे पूरा झुंड नीचे उतरने लगा। गगन ने जब देखा कि उसका पूरा परिवार नीचे जा रहा है, तो वह उन्हें अकेला नहीं छोड़ सकता था। भारी मन से वह भी नीचे उतर आया।
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जैसे ही कबूतरों ने दाना चुगना शुरू किया, उन्हें अहसास हुआ कि दाने तो बहुत कम हैं और उनके पैरों के नीचे कुछ अजीब सा धागा है। इससे पहले कि वे कुछ समझ पाते, एक बड़ा सा बारीक सूती जाल उनके ऊपर आ गिरा।
झाड़ियों के पीछे से एक खूंखार शिकारी, जिसका नाम 'भैरव' था, हाथ में लाठी लिए और चेहरे पर शैतानी मुस्कान लिए बाहर निकला। वह मन ही मन खुश हो रहा था, "वाह! आज तो एक साथ इतने सारे कबूतर हाथ लगे हैं। बाज़ार में इनकी अच्छी कीमत मिलेगी।"
जाल के अंदर का हाहाकार और गगन की योजना
जाल में फंसते ही कबूतरों में भगदड़ मच गई। हर कोई अपनी जान बचाने के लिए अलग-अलग दिशा में पंख फड़फड़ाने लगा। कोई ऊपर भाग रहा था, तो कोई किनारे की ओर। लेकिन जाल इतना मज़बूत था कि कोई भी उसे तोड़ नहीं पा रहा था।
"हम सब मारे जाएंगे! यह शिकारी हमें पकड़ लेगा!" महक डर के मारे काँप रही थी।
शिकारी अब मुश्किल से दस कदम दूर था। तभी गगन ने अपनी पूरी ताकत से चिल्लाकर कहा, "सब रुक जाओ! अलग-अलग उड़ोगे तो अपनी जान गंवा बैठोगे। इस जाल को काटना हमारे बस में नहीं है, लेकिन हम इसे साथ लेकर उड़ सकते हैं। मेरी बात ध्यान से सुनो—जब मैं तीन तक गिनती गिनूँ, तो सब अपनी पूरी ताकत लगाकर एक साथ ऊपर की ओर उड़ना। हम इस पूरे जाल को ही साथ लेकर उड़ चलेंगे!"
कबूतरों ने गगन की आँखों में वह दृढ़ निश्चय देखा। उन्होंने अपनी घबराहट को एक तरफ रखा।
गगन ने गिनती शुरू की: "एक... दो... और... तीन! अब ज़ोर लगाओ!"
एकता का चमत्कार: उड़ता हुआ जाल
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जो नज़ारा उसके बाद दिखा, उसने शिकारी के होश उड़ा दिए। हज़ारों पंखों की फड़फड़ाहट एक गर्जना जैसी सुनाई दी। शिकारी ने देखा कि उसका भारी-भरकम जाल, जो ज़मीन पर जमा होना चाहिए था, अचानक हवा में ऊपर उठने लगा।
कबूतरों ने एक इकाई की तरह काम किया। उन्होंने अपनी व्यक्तिगत शक्ति को एक सामूहिक शक्ति में बदल दिया था। जाल के साथ पूरा झुंड आकाश की ओर चढ़ने लगा। शिकारी बदहवास होकर उनके पीछे भागा। वह चिल्ला रहा था, "रुको! तुम कहाँ जा रहे हो? मेरा जाल वापस लाओ!"
वह काफी दूर तक उनके पीछे दौड़ता रहा, उसकी आँखें फटी की फटी रह गई थीं। उसने कभी नहीं सोचा था कि छोटे-छोटे पक्षी मिलकर उसके जाल को खिलौना बना देंगे। कुछ देर बाद शिकारी थक कर गिर पड़ा और कबूतर उसकी नज़रों से ओझल हो गए।
सच्चे मित्र की तलाश और आज़ादी की सुबह
हवा में उड़ते हुए कबूतर अब थकने लगे थे। जाल का भार काफी ज़्यादा था। महक ने पूछा, "गगन, हम कितनी देर ऐसे उड़ेंगे? हमारे पंख जवाब दे रहे हैं।"
गगन ने हौसला बढ़ाते हुए कहा, "बस थोड़ी दूर और। पास की पहाड़ी के नीचे मेरा एक पुराना मित्र रहता है—'चुटकु' चूहा। वह बहुत वफादार है और उसके दांत बहुत तेज़ हैं। वही हमें इस मुसीबत से निकाल सकता है।"
कुछ ही समय में वे उस स्थान पर पहुँच गए जहाँ चुटकु चूहा अपने बिल में रहता था। गगन ने उसे पुकारा। जैसे ही चुटकु बाहर आया और उसने अपने मित्र को जाल में फँसा देखा, वह तुरंत समझ गया कि क्या करना है।
चुटकु ने अपने तीखे दांतों से जाल को काटना शुरू किया। सबसे पहले उसने गगन के जाल को काटने की कोशिश की, लेकिन गगन ने मना कर दिया। गगन ने कहा, "नहीं मित्र, पहले मेरे परिवार और मेरे साथियों को आज़ाद करो। एक मुखिया का धर्म है कि वह अपने पीछे आने वालों की सुरक्षा पहले सुनिश्चित करे।"
चुटकु ने एक-एक करके सभी कबूतरों को आज़ाद किया और अंत में गगन को। सभी कबूतरों ने चैन की सांस ली। उन्होंने गगन से अपनी गलती की माफी माँगी और चुटकु चूहे का धन्यवाद किया।
उस दिन चंदन वन के आकाश में फिर से वही नीले-स्लेटी पंख लहरा रहे थे, लेकिन अब उनमें पहले से कहीं ज़्यादा एकता और समझदारी थी।
सीख (Moral of the Story):
एकता में अपार शक्ति होती है। जब हम मिलकर काम करते हैं, तो बड़ी से बड़ी मुसीबत और ताकतवर से ताकतवर दुश्मन को भी हराया जा सकता है। साथ ही, संकट के समय घबराने के बजाय सूझबूझ और सामूहिक प्रयास ही सफलता की कुंजी है।
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